अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल कंपनी आराम्को की बक़ीक और हरीज़ आयल रिफ़ाइनरियों पर हुए ड्रोन हमले को लेकर प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने कहा कि जिसने यह हमला किया है उसके बारे में उन्हें पता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने ट्वीट कर कहा है कि, ''सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमले हुए हैं, हम जिसे दोषी मान रहे हैं उस पर भरोसा करने के कारण हैं, हम सऊदी अरब का इंतेज़ार कर रहे हैं कि वह इस हमले को कैसे देख रहे हैं, इसके बाद हम फ़ैसला लेंगे कि आगे क्या करना है।'' ट्रम्प के ट्वीट को इस रूप में देखा जा रहा है कि अमरीकी सेना कार्रवाई कर सकती है। शनिवार को सऊदी के तेल ठिकानों पर हमले के बाद से तनाव काफ़ी बढ़ गया है। कहा जा रहा है कि अमेरिका राष्ट्रपति ने ट्रंप ने इतनी आक्रामक भाषा का इस्तेमाल इसी वर्ष जून में किया था जब उन्होंने कथित तौर पर ईरान पर हमले की योजना को टाल दिया था। तब ईरान ने अमरीकी ड्रोन को मार गिराया था।
शनिवार को सऊदी के सबसे अहम तेल ठिकानों पर हमला हुआ जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति में पांच प्रतिशत की आपूर्ति बाधित हो गई है। इस हमले की ज़िम्मेदारी यमनी सेना और वहां के स्वयंसेवी बलों ने ली है। अमरीकी अधिकारी लगातार यह कह रहे हैं कि सऊदी अरब की जिन रिफ़ाइनरियां को निशाना बनाया गया है, उससे लगता नहीं है कि हमला यमन से हुआ है। अमेरिकी अधिकारी यह आरोप लगा रहे है कि यह ड्रोन हमला शायद इराक़ या ईरान की तरफ़ से हुआ है। सीएनएन से अमरीकी अधिकारियों ने कहा है कि हमले में सऊदी के 19 ठिकाने प्रभावित हुए हैं और यह 10 ड्रोन से संभव नहीं है। यमनी सेना और स्वयंसेवी बलों ने हमले के बाद यह दावा किया था कि हमले के लिए उन्होंने 10 ड्रोन भेजे थे। सीएनएन से बात करते हुए एक अमेरिकी सैन्य अधिकारी ने कहा, ''आप 10 ड्रोन से 10 ठिकानों के निशाने पर नहीं ले सकते हैं''

एक ओर ट्रंप प्रशासन यह तो दावा कर रहा है कि ड्रोन ईरान या इराक़ से आए लेकिन वह इस बात को आधिकारिक तौर पर कह रहे हैं और न ही उनके पास इस संबंध में कोई सबूत हैं। सीएनएन के सैन्य विशेषज्ञ रिटायर्ड कर्नल सेड्रिक लीगटन ने कहा, ''यह बहुत रणनीतिक हमला है, इसे इस तरह से प्लान किया गया कि रडार की पकड़ में ड्रोन नहीं आए। उन्होंने कहा कि, जिन ठिकानों को निशाने पर लिया गया वह काफ़ी अहम हैं, यह कोई सरकार ही कर सकती है न कि यमनी सेना और वहां के स्वयंसेवी बले। लीगटन ने भी बिना किसी साक्ष्य के यह दावा किया कि सऊदी ऑयल रिफ़ाइनरियों पर हमले में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन या तो ईरान से आए या इराक़ से।''
इस्लामी गणतंत्र ईरान के राष्ट्रपति डॉक्टर हसन रूहानी ने एक प्रेस वार्ता में सऊदी अरब की ऑयल रिफ़ाइनरी पर हुए ड्रोन हमले का उल्लेख किए बिना कहा कि अमरीका इलाक़े में युद्ध अभियान चला रहा है और इसी के तहत सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात को हथियार और ख़ुफ़िया मदद मुहैया करा रहा है। राष्ट्रपति रूहानी ने कहा, ''इस इलाक़े में जो आज हो रहा है वह चिंताजनक है। याद रहे कि ईरान हमेशा से युद्ध का विरोधी रहा है और तेहरान की यह नीति रही है कि क्षेत्र और दुनिया में किसी भी समस्या का हल वार्ता के माध्यम से निकाला जा सकता है और ईरानी विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने भी हाल ही में एक ट्वीट के माध्यम से कहा है कि अगर यमन संकट के संबंध में तेहरान के सुझावों को स्वीकार कर लिया जाए तो यह युद्ध और संकंट दोनों समाप्त हो सकते हैं।

इस बीच दुनिया भर के कई टीकाकारों और मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने सऊदी अरब की ऑयल रिफ़ाइनरी पर हुए ड्रोन हमले को जहां यमन की जवाबी कार्यवाही बताई है वहीं कहा है कि, जिस तरह अमेरिका, ब्रिटेन और पश्चिमी देश सऊदी तेल कंपनी पर हुए ड्रोन हमले पर इतना परेशान और दुखी दिखाई दे रहे हैं अगर वे पांच वर्षों से जिस तरह उनके ही द्वारा सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात को बेचे गए हथियारों से इस ग़रीब देश के लोगों के जनसंहार दुखी होते तो यह दिन न उन्हें देखने को मिलता और न ही सऊदी अरब को। टीकाकारों का मानना है कि इस दुनिया में अब इंसानों की जान से ज़्यादा तेल और अर्थव्यवस्था की क़ीमत और महत्व हो गया है।
इन सबके बीच एक प्रश्न जो सबसे ज़्यादा पूछा जा रहा है वह यह है कि अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, इस्राईल और अन्य पश्चिमी सरकारें कि जो अरबों डॉलरों के हथियार लगातार सऊदी अरब को बेच रही हैं उनके इतने अत्याधुनिक हथियारों के रहते हुए क्यों सऊदी अरब यमनी सेना और स्वयंसेवियों के जवाबी हमलों को रोक नहीं पा रहा है? यमन मध्यपूर्व का एक छोटा सा ग़रीब देश है। इसके ख़िलाफ़ अरब के अमीर देश अमेरिका और पश्चिमी देशों और इस्राईल की मदद से लगातार बम बरसा रहे हैं। यमन के ख़िलाफ़ सऊदी अरब इस युद्ध का नेतृत्व कर रहा है। सऊदी के पास यमन में उसके दुश्मनों की तुलना में ज़्यादा बेहतर और अत्याधुनिक हथियार हैं, लेकिन हैरान करने वाली बात है कि वह इस युद्ध को जीतने के बजाए हार के बिल्कुल क़रीब जा पहुंचा है। आख़िर ऐसा क्यों है? सऊदी के पास पैसे की कमी नहीं है, अत्याधुनिक हथियार हैं फिर भी उसकी सेना यमन से युद्ध क्यों नहीं जीत पा रही है? सऊदी अरब के लिए बड़ी चुनौती है कि वह तेल के बेशुमार पैसे को आर्मी की ताक़त के रूप में परिवर्तित करे। सऊदी के बारे में कहा जाता है कि वह पैसे से सब कुछ नहीं ख़रीद सकता, इसलिए यह बात भी कही जाती है कि वह धनवान तो है पर बलवान नहीं।

वैसे इसका एक और कारण हो सकता है और वह यह कि, सऊदी अरब का शाही परिवार इस बात से डरा रहता है कि अगर इस देश की सेना मज़बूत हुई तो तख्तापलट भी हो सकता है। इसलिए सऊदी अपनी सुरक्षा और सेना की ज़रूरतों के लिए अमरीका पश्चिमी ताक़तों पर निर्भर रहता है। यमन के ख़िलाफ़ युद्ध में सऊदी अरब कितना ख़र्च कर चुका है इसकी जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है। लेकिन पिछले दो वर्षों में सऊदी के कुल विदेशी धन में 200 अरब डॉलर की गिरावट से साफ़ है कि उसे जमकर आर्थिक नुक़सान हो रहा है।
(रविश ज़ैदी)